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क्या आसन में बैठ कर ध्यान करना बेहतर है।

क्या Meditation करने के लिए किसी विशेष प्रकार के आसन का चयन करना जरूरी है। 

हमारे शरीर की हर स्थिति, हमारे मन की स्तिथि से बहुत गहरे में जुडी है। जैसे की अगर आपको कहे की आपने खड़े होकर सोना है। तो आप ऐसा बिल्कुल नही कर सकते। पर आपको अगर कहे की लेटकर सोना है।

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तो ये आपके लिए बहुत ही आसान हो जायेगा। अगर आप खड़े होकर ध्यान करोगे। तो पहली बात आपको आलस्य आने का कोई डर नही रहेगा। खड़े होकर ध्यान करते बक्त जो शरीर की क्रियाएँ होती है। वो आसानी से हो जायेगी। उसमे किसी प्रकार का विघ्न नही पड़ेगा।

क्रियाओ के अपने आप होने से आप गहरे ध्यान में आसानी से जा सकते हो। यह क्रियाएँ आप बैठ कर या लेटे हुए ध्यान के समय में नही कर सकते। अगर आप गहरे ध्यान में जाओगे। तो आप महसूस करोगे की आपके पैर अपने आप नाचने लगे।

जब आपके शरीर के चक्र जागृत होंगे, तो यह क्रियाएँ होनी अनिवार्य है। इसलिए पहले के समय में साधको को आसन में बैठ कर ध्यान करना सिखाया जाता था। आसन जैसे की सुख आसन, पद्मासन आदि, कियो की आसान में साधन हिल ढुल नही सकता था। पहले के गुरुओ का मानना था की अगर साधक। 

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साधना के समय ऐसी क्रियाएँ करेगा। तो वो पागल ना माना जाये। तो आसनों का अभ्यास कराया गया। शरीर के Movement की सर्वहाधिक सम्भावना खड़े होकर ध्यान करने में है। हम बहुत सी बाते अपने मन में दबाये चले जाते है। जिसको कोई भी बहार निकलने का रास्ता नही मिलता। जैसे की अगर आप क्रोध की अवस्था में होते हो। तो ऐसे काम करते हो।

जो की आप अगर सामान्य अवस्था में होते, तो कभी ना करते। जेसे की गाली देना। किसी पर पत्थर फेंकना। यह सब आप अपने अंदर दबे विचारो के कारण करते हो। क्रोध की अवस्था में बस थोड़े से विचार ही बहार आ पाते है।

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तो गहरे ध्यान में जाने से पहले अंदर दबे विचारो का बहार आ जाना जरूरी है। अगर आपको गहरे ध्यान में जाने में सालो लग जाते है। तो अपने अंदर दबे विचारो की बहार निकाल कर ध्यान करने से आपको गहरे ध्यान के परिणाम कुछ महीनो में मिलने लग जायेगे।

क्योकि जो चीज, जैसे की आपके विचार आपको गहरे ध्यान में ले जाने से रोकते है। बह जब आपके शरीर से बहार निकल जायेगे। तो आप ध्यान के शिखर को आसानी से प्राप्त कर पाओ गए। यह सब, तब संभव है जब आप ध्यान के समय अपने शरीर को बिलकुल ढीला छोडोगे। 

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